मुगल सल्तनत की बेगमों और बेटियों ने भारत में क्या-क्या बनवाया?

मुगल सल्तनत की बेगमों और बेटियों ने भारत में क्या-क्या बनवाया?

भारत के इतिहास में मुगल सल्तनत को अक्सर बादशाहों बाबर, अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगज़ेब के संदर्भ में याद किया जाता है. लेकिन इतिहास के पन्नों में एक और अहम किरदार मौजूद है, जिसे अक्सर हाशिए पर रखा गया. वह है मुगल शाही महिलाओं का. ये सिर्फ पर्दे के पीछे बैठी औरतें नहीं थीं, बल्कि राज-काज में इनकी अहम भूमिका पाई जाती है. कला-संस्कृति, स्थापत्य कला व जन-कल्याणकारी निर्माण कार्यों में इनकी महती भूमिका रही है.

इतिहासकारों ने हुमायूंनामा (गुलबदन बेगम), समकालीन फ़ारसी दस्तावेज़, शिलालेख, यात्रा-वृत्तांत तथा वास्तुशिल्पीय साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि भारत की जमीन पर खड़े कई महत्त्वपूर्ण भवन, मस्जिदें, बाग़, सराय, पुल और मक़बरे वास्तव में मुगल महिलाओं की देन हैं. केवल दिल्ली पर नजर डालें तो पता चलता है कि दर्जनों इमारतें मुगल सल्तनत की महिलाओं की प्रेरणा से ही बने हैं. आइए, इन्हें विस्तार से जानते हैं.

1- हामिदा बानो बेगम और हुमायूं का मक़बरा

हामिदा बानो बेगम, बादशाह हुमायूं की बेगम और अकबर की मां थीं. वे मुग़ल राजनीति में अपेक्षाकृत शांत लेकिन अत्यंत प्रभावशाली शख्सियत के तौर पर जानी जाती हैं. उन्हीं की प्रेरणा कहिए या आदेश, पर दिल्ली में हुमायूं का मक़बरा (Humayuns Tomb) बना. यह निर्माण 1560 के दशक में हुआ था. यह मकबरा आज भी दिल्ली की शान है.

Humayuns Tomb

हुमायूं का मकबरा.

यह भारत का पहला भव्य उद्यान-मक़बरा (Garden Tomb) माना जाता है. बाद के मुगल मक़बरों के लिए यह एक प्रकार का स्थापत्यिक नमूना (Prototype) बना. फ़ारसी, मध्य एशियाई और भारतीय स्थापत्य परंपराओं का मिश्रण इसकी योजना में स्पष्ट दिखता है. चारबाग़ योजना, लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का सुंदर संयोजन, मेहराबों व गुम्बदों का समन्वय आदि. हामिदा बानो का यह कदम केवल शौकिया नहीं था, यह एक राजनीतिक व सांस्कृतिक वक्तव्य भी था. उन्होंने दिल्ली को एक बार फिर वैध मुगल राजधानी के रूप में स्थापित करने में मदद की, जहाँ उनके पति हुमायूँ को शान से दफ़नाया गया.

Nur Jahan

जहांगीर की बेगम नूरजहां.

2- नूरजहां: सत्ता, सौंदर्य और स्थापत्य की महारानी

जहांगीर की बेगम नूरजहां का नाम मुगल इतिहास में शक्ति, सौंदर्य और कूटनीति के साथ-साथ स्थापत्य कला से भी जुड़ा है. वे खुद काव्य, चित्रकला, वस्त्र-डिज़ाइन और इमारतों की संरचना में गहरी दिलचस्पी रखती थीं. उन्होंने कई निर्माण करवाए.

  • इतमाद-उद-दौला का मक़बरा: नूरजहां ने आगरा में इतमाद-उद-दौला का मक़बरा बनवाया. यमुना नदी के किनारे इस मकबरे का निर्माण साल 1620 से 1628 के बीच हुआ था. यह नूरजहां के पिता ग़ियास बेग (उपाधि इतमाद-उद-दौला) के लिए बना था. इसे ताज महल का वास्तु-पूर्वज भी कहा जाता है. पूरा मक़बरा अपेक्षाकृत छोटा, पर बेहद नाजुक कारीगरी वाला है. जालियों और इनले वर्क ने इसे ज्वेल बॉक्स जैसी छवि दी है. यह मक़बरा दर्शाता है कि नूरजहां केवल शाही खर्च की निरीक्षक नहीं थीं, बल्कि वे इमारत के कलात्मक स्वाद और नक़्शे में सक्रिय भागीदारी करती थीं.
  • जहांगीर का मक़बरा: यह मक़बरा आज पाकिस्तान में स्थित है, परंतु मुग़ल सल्तनत के संयुक्त सांस्कृतिक भूगोल के संदर्भ में नूरजहां की भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण है. कई ऐतिहासिक स्रोतों में इस बात के संकेत हैं कि जहांगीर के मक़बरे की योजना व सजावट में नूरजहां का हस्तक्षेप या प्रेरणा रही. इससे यह स्पष्ट है कि भारत-केंद्रित मुगल सत्ता की वह केवल राजमहिषी नहीं बल्कि स्थापत्य नीति-निर्माता भी थी.
  • सरायें, बाग़ और पुल: नूरजहां ने कई सराय, बाग़ और पुलों के निर्माण में भी भाग लिया. उपमहाद्वीप में यात्रा व व्यापार के मार्गों पर बनी कुछ सरायों का श्रेय समकालीन फ़ारसी स्रोत नूरजहां के संरक्षण को देते हैं. भारत के उत्तरी इलाकों में मार्ग-सुविधाओं का विस्तार उस समय के व्यापार को भी मज़बूती देता था.
taj mahal

शाहजहां की प्रिय बेगम मुमताज़ महल के मक़बरे के रूप में ताजमहल को पहचाना जाता है.

3- मुमताज़ महल और ताज महल की प्रेरणा

मुमताज़ महल स्वयं किसी भवन की प्रत्यक्ष निर्माता नहीं रहीं, किंतु भारत की सबसे प्रसिद्ध इमारत ताज महल का अस्तित्व उनके नाम और स्मृति से जुड़ा है. विश्व प्रसिद्ध ताज महल आगरा में यमुना किनारे स्थित है. इसका निर्माण 1630 के दशक से लगभग मध्य 17वीं सदी तक हुआ. शाहजहां की प्रिय बेगम मुमताज़ महल के मक़बरे के रूप में इसे पहचाना जाता है. निर्माण से जुड़े शिलालेखों व परंपराओं से संकेत मिलता है कि शाही हरम की औरतें, खासकर शाही बेटियां, कलात्मक निर्णयों व दान में शामिल रहती थीं.

Chandini Chowk History Mughal Princess Jahanara Begum

शाहजहां की बेटी जहांआरा बेगम ने चांदनी चौक को डिजाइन किया था. फोटो: Getty Images

4- जहांआरा बेगम: शाहजहां की बेटी, दिल्ली और आगरा की संरक्षिका

जहांआरा बेगम, शाहजहां और मुमताज़ महल की सुपुत्री थीं. वे सूफ़ी परंपरा से भी जुड़ी थीं और राजनीति व समाज में अत्यंत प्रभावशाली रहीं. उनकी संपत्ति, जागीरें और स्वतंत्र निर्णय क्षमता ने उन्हें कई बड़े निर्माण कार्य करवाने लायक बनाया. इनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं.

  • जामा मस्जिद के आसपास का शहरी विकास: दिल्ली की जामा मस्जिद का मुख्य निर्माण शाहजहां के नाम से जुड़ा है, लेकिन जहांआरा बेगम ने दिल्ली (शाहजहांनाबाद) के शहरी विकास, बाज़ारों और कुछ सार्वजनिक स्थलों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
  • चांदनी चौक और सराय: परंपरा और कुछ लिखित स्रोतों के अनुसार चांदनी चौक और उससे जुड़े बाज़ार-क्षेत्रों की योजना में जहांआरा बेगम की बड़ी भूमिका मानी जाती है. उन्होंने व्यापारिक सराय, कारवां-सराय व बाग़ के निर्माण को बढ़ावा दिया, जिससे दिल्ली एक महत्वपूर्ण व व्यवस्थित वाणिज्यिक नगर के रूप में फलने-फूलने लगी.
  • अजमेर में सोफ़िया/सूफ़ी स्थलों से जुड़ाव: जहांआरा सूफ़ी संत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से गहरा लगाव रखती थीं. कहा जाता है कि उन्होंने अजमेर व दिल्ली में सूफ़ी दरगाहों से जुड़े कुछ निर्माण तथा मरम्मत कार्यों में आर्थिक मदद की. यह भारत की सूफ़ी-स्थापत्य परंपरा में शाही महिलाओं की भागीदारी की मिसाल है.

5- ज़ेबुन्निसा बेगम: विद्वान शहज़ादी और स्थापत्य संरक्षण

ज़ेबुन्निसा, औरंगज़ेब की विद्वान पुत्री थीं. वे फ़ारसी काव्य में निपुण, सूफ़ी चिंतन से प्रेरित और सांस्कृतिक संरक्षक के रूप में जानी जाती हैं. भारत में अनेक मस्जिदों, इमारतों और बाग़ों के शिलालेखों में ज़ेबुन्निसा द्वारा दी गई आर्थिक सहायता का ज़िक्र आता है. कुछ स्रोत दिल्ली आधारित इमारतों, बाग़ों और पानी की सुविधाओं में उनके योगदान की बात करते हैं, यद्यपि बहुत-सी संरचनाएं समय के साथ या तो नष्ट हो चुकी हैं या पुनर्निर्माण के कारण मूल रूप में पहचानना कठिन हो गया है. फिर भी यह दर्शाता है कि औरंगज़ेब-जैसे अपेक्षाकृत सख्त शासक के होते हुए भी स्त्रियाँ सांस्कृतिक व धार्मिक कार्यों के संरक्षण में सक्रिय थीं.

Chandini Chowk Name History In Hindi

चांदनी चौक.

6- मुगल महिलाओं के निर्माण कार्य

मुगल इतिहास केवल शाही बेगमों और शहज़ादियों तक सीमित नहीं. कई अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध महिलाएं भी भवन, मस्जिद, सराय और कुओं के निर्माण की प्रेरक रही हैं.

  • महम अनगा और अन्य दरबारी स्त्रियां: अकबर के शासनकाल में उसकी धाय माँ महम अनगा व अन्य दरबारी स्त्रियों ने भी कुछ मस्जिदें और भवन बनवाए. कुछ सरायों व मस्जिदों पर शिलालेख उनके नाम का उल्लेख करते हैं.
  • स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर निर्माण: मुगल प्रशासनिक ढांचे में नवाबों, सूबेदारों और अमीरों के साथ उनकी पत्नियां भी स्थानीय स्तर पर निर्माण को संरक्षण देती थीं. कुएं, बावड़ियां, सड़कों के किनारे मस्जिदें, छोटी सरायें, मदरसे और मदरसा-मक़बरा परिसर आदि में शाही या अर्ध-शाही महिलाओं के दान का उल्लेख मिलने पर इतिहासकार यह समझते हैं कि जनकल्याणकारी कार्य केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थे. भारत के कई छोटे शहरों और कस्बों में आज भी ऐसी मस्जिदें और मक़बरे हैं जिनके शिलालेखों पर किसी बेगम, बीबी या बेगम साहिबा का नाम दर्ज है, भले ही वे बड़े इतिहास-ग्रंथों में न मिलें.

मुगल हरम और स्थापत्य निर्णय प्रक्रिया

अक्सर यह मान लिया जाता है कि मुगल हरम की औरतें केवल पर्दे में सीमित थीं और उनका काम केवल निजी था. लेकिन समकालीन स्रोत बताते हैं कि कई शाही महिलाओं के पास अपनी अलग जागीरें, आय के स्रोत, व्यापारिक हिस्सेदारी और ज़मीनें थीं. वे इस संपत्ति से इमारतें, सरायें और पुल बनवाने के लिए स्वतंत्र रूप से धन लगा सकती थीं. शाही महिलाएँ विदेशी दूतावासों, सूफ़ी संतों और विद्वानों से संवाद रखती थीं. कई बार वे वास्तुकारों से सीधे चर्चा करतीं, नक़्शे देखतीं और कलात्मक तत्वों पर सुझाव देतीं. भारत में खड़े अनेक स्मारकों की सजावट व शिलालेखों में स्त्रियों के नाम दर्ज होना इस बात का प्रमाण है कि उनकी भूमिका केवल प्रतीकात्मक नहीं थी.

जब हम मुगल सल्तनत के स्थापत्य की बात करते हैं, तो आमतौर पर हमारे सामने बादशाहों के नाम आते हैं. अकबर का फ़तेहपुर सीकरी, शाहजहां का ताज महल, औरंगज़ेब की मस्जिदें आदि लेकिन यदि हम इतिहास के पृष्ठों को थोड़ा और ध्यान से पलटें, तो हमें साफ़ दिखता है कि भारत के इस स्थापत्यिक वैभव के पीछे शाही महिलाओं का बड़ा और स्वतंत्र योगदान है. उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *