दो घंटे तक जान की लगाता रहा गुहार, बचाओ-बचाओ चिल्लाता रहा…पिता के सामने डूब गया उसका इंजीनियर बेटा..


गौतमबुद्धनगर। उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक राजस्व देने वाला गौतमबुद्धनगर जिला आपदा के समय लोगों की जान बचाने के लिए आवश्यक संसाधनों के मामले में पूरी तरह असहाय नजर आया। इंजीनियर युवराज मेहता की मौत ने जिला प्रशासन, पुलिस, प्राधिकरण और दमकल विभाग की राहत एवं बचाव तैयारियों की पोल खोलकर रख दी है।

निर्माणाधीन बेसमेंट में भरे पानी में कार गिरने के बाद युवराज मेहता करीब दो घंटे तक अपनी जान बचाने की गुहार लगाता रहा। वह कार की छत पर खड़ा होकर मदद के लिए चिल्लाता रहा, लेकिन मौके पर मौजूद पुलिस, दमकल विभाग और एसडीआरएफ की टीमें उसे बाहर निकालने में असफल रहीं। आखिरकार पिता राजकुमार मेहता की आंखों के सामने युवराज कार समेत पानी में डूब गया।

पिता को किया फोन, मौके पर पहुंचीं टीमें
घटना दोपहर करीब 12 बजे की बताई जा रही है। हादसे के तुरंत बाद युवराज ने अपने पिता को फोन कर मदद मांगी और डायल 112 पर भी कॉल की गई। सूचना मिलने पर स्थानीय पुलिस, दमकल विभाग और बाद में एसडीआरएफ की टीम करीब एक बजे तक मौके पर पहुंच गई। बड़ी संख्या में लोग भी घटनास्थल पर जुट गए, लेकिन बचाव कार्य आगे नहीं बढ़ सका।

पुलिस, दमकल और एसडीआरएफ के पास नहीं थे संसाधन
मौके पर मौजूद पुलिस के पास रेस्क्यू के लिए कोई प्रभावी उपकरण नहीं थे। स्थानीय गोताखोर पानी में उतरने से हिचकते रहे और कुछ दूरी तक जाकर वापस लौट आए। दमकल और एसडीआरएफ की टीमों के पास भी पर्याप्त संसाधनों का अभाव दिखा। क्रेन मंगाई गई, लेकिन तब भी युवराज तक पहुंचना संभव नहीं हो सका।

गाजियाबाद से बुलाई गई एनडीआरएफ
स्थिति गंभीर होते देख प्रभारी निरीक्षक सर्वेश सिंह ने गाजियाबाद से एनडीआरएफ की टीम को बुलाया। हालांकि, तब तक काफी देर हो चुकी थी और युवराज की जान नहीं बचाई जा सकी।एनडीआरएफ की टीम को शव और कार बाहर निकालने में करीब दो घंटे का समय लगा।

प्रत्यक्षदर्शियों और पिता ने उठाए सवाल
प्रत्यक्षदर्शी मुनेंद्र का कहना है कि पुलिस और अन्य विभागों के कर्मचारी मूकदर्शक बने रहे, कोई भी पानी में उतरने की हिम्मत नहीं कर सका। वहीं पिता राजकुमार मेहता का आरोप है कि यदि समय रहते पर्याप्त संसाधन और गंभीर प्रयास किए जाते, तो उनके बेटे की जान बच सकती थी।

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