गुरु हजरत निजामुद्दीन के लिए अमीर खुसरो बसंती रंग में क्यों रंगे? दिल्ली की दरगाह पर मनने लगा पंचमी का उत्सव

गुरु हजरत निजामुद्दीन के लिए अमीर खुसरो बसंती रंग में क्यों रंगे? दिल्ली की दरगाह पर मनने लगा पंचमी का उत्सव

दिल्ली की संस्कृति को अगर किसी एक धागे में पिरोया जाए, तो वह धागा मिलन का होगा. भाषाओं का, धर्मों का, संगीत का, लोक-परंपराओं का और ऋतुओं के उत्सवों का. इसी मिलन का सबसे खूबसूरत रूप हमें हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के आसपास दिखाई देता है, जहां सूफी परंपरा की करुणा और हिंदुस्तानी लोक-जीवन की रंग-बिरंगी ऋतु-उत्सव-परंपराएं एक-दूसरे में घुलती नज़र आती हैं. इस सांस्कृतिक संगम का एक प्रतीकात्मक उत्सव है, बसंत पंचमी.

बसंत पंचमी वो दिन है जब दिल्ली में, खासतौर पर निजामुद्दीन क्षेत्र में, केवल एक त्योहार नहीं बल्कि एक याद की तरह जिया जाता है. इस याद के केंद्र में एक नाम बार-बार आता है, वह है अमीर खुसरो. आइए, बसंत पंचमी (जनवरी 23, 2026) के बहाने निजामुद्दीन औलिया की दरगाह, अमीर खुसरो और बसंत पंचमी के आपसी कनेक्शन को समझने का प्रयास करते हैं.

कौन थे निजामुद्दीन औलिया?

हजरत निजामुद्दीन औलिया दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित सूफी संतों में माने जाते हैं. सूफी परंपरा का मूल स्वर इश्क़ है, ईश्वर के प्रति प्रेम और सृष्टि के प्रति करुणा. दरगाह की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामूहिकता का अनुभव भी है. कव्वाली, फकीरी, सेवा, लंगर और लोगों का बिना भेदभाव के एक जगह आना. इसी कारण निजामुद्दीन की दरगाह दिल्ली की साझा संस्कृति का एक बड़ा केंद्र बन गई. दरगाह से जुड़े ऐसे कई अवसर हैं जिनमें आध्यात्मिक भाव, कला और लोक-परंपरा साथ चलते हैं. बसंत पंचमी भी उनमें एक है, जिसे यहाँ खास अंदाज़ में मनाया जाता है. पीले रंग, फूलों और मौसम के स्वागत के साथ.

Hazrat Nizamuddin Auliya Amir Khusro Connection

अमीर खुसरो और निजामुद्दीन औलिया.

अमीर खुसरो: शागिर्द, कवि और संगीतकार

अमीर खुसरो का नाम आते ही कविता और संगीत की एक दुनिया खुल जाती है. उन्हें अक्सर निजामुद्दीन औलिया का प्रिय शिष्य, दरबारी कवि, लोक-भाषाओं के रचनाकार और संगीत-परंपरा के प्रयोगशील कलाकार के रूप में याद किया जाता है. खुसरो की सबसे बड़ी भूमिका यही थी कि उन्होंने ऊंची और लोक, दोनों तरह की सांस्कृतिक धाराओं के बीच पुल का काम किया. उन्होंने उस समय के हिंदुस्तान की बहुभाषिकता और बहुरंगी लोक-परंपराओं को अपने काव्य और संगीत में जगह दी. यही कारण है कि खुसरो का व्यक्तित्व बसंत जैसे ऋतु-उत्सव के साथ सहज रूप से जुड़ जाता है, क्योंकि बसंत भी तो प्रकृति और लोक-जीवन का उत्सव है, जो सीमाएं नहीं देखता.

जब सूफी परंपरा ने बसंत को अपनाया

बसंत पंचमी भारत में बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक पर्व माना जाता है. इस दिन का लोक-भाव नई शुरुआत का है. खेतों में पीली सरसों, पेड़ों पर नई कोंपलें, हवा में हल्की गरमी और मन में उमंग. उत्तर भारत में बसंत का रंग पीला माना जाता है, इसलिए लोग पीले वस्त्र पहनते हैं, पीले पकवान बनाते हैं और पीले फूलों से सजावट करते हैं. दिल्ली में बसंत पंचमी का एक ऐतिहासिक-लोक रंग भी रहा है, पतंगबाज़ी, गीत-संगीत और मेलों की परंपरा. यही लोक-रंग सूफियाना माहौल के साथ मिलकर निजामुद्दीन क्षेत्र में एक अलग ही सांस्कृतिक अनुभव बनाता है.

Basant Panchami Hazrat Nizamuddin Auliya Dargah (1)

दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह. फोटो: Getty Images

हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में बसंत का जुड़ना किसी एकतरफा धार्मिक कारण से नहीं, बल्कि दिल्ली की साझा संस्कृति के स्वभाव से समझा जा सकता है. सूफी दरगाहों का समाज से गहरा रिश्ता रहा है. लोगों के दुख-सुख, उनके मौसम, उनकी भाषाएं, उनके गीत, सब इसमें शामिल होते हैं. बसंत पंचमी के दिन लोग दरगाह पर पीले फूल चढ़ाते हैं, पीले कपड़े पहनकर आते हैं और मौसम की खुशी को आध्यात्मिक कृतज्ञता में बदल देते हैं. दरगाह के आसपास इस दिन का माहौल आम दिनों से अधिक रंगीन, अधिक संगीतपूर्ण और अधिक बासंती दिखाई देता है. यह मानो प्रकृति के उल्लास को ईश्वर-प्रेम की भाषा में व्यक्त करने का तरीका है.

Basant Panchami Hazrat Nizamuddin Auliya Dargah

दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर बसंत पंचमी खास तरह से मनाई जाती है. फोटो: Getty Images

अमीर खुसरो और बसंत: परंपरा में जीवित एक भाव

निजामुद्दीन औलिया-खुसरो संबंध को अक्सर गुरु-शिष्य के अतिशय प्रेम, अपनत्व और आध्यात्मिक निकटता के रूप में याद किया जाता है. परंपरा में बसंत पंचमी को लेकर जो बात सबसे ज्यादा कही-सुनी जाती है, वह यह कि खुसरो ने बसंत के रंग-रूप को अपनाकर अपने पीर (गुरु) के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की और तभी से दरगाह में बसंत मनाने की परंपरा मजबूत हुई. इस कथा-परंपरा का ऐतिहासिक विवरण अलग-अलग रूपों में मिलता है, लेकिन इसका सांस्कृतिक अर्थ बहुत स्पष्ट है. खुसरो बसंत को ऋतु नहीं रहने देते, उसे भाव बना देते हैं. ऐसा भाव जो दुख के बीच भी आशा जगाए, और विरह के बीच भी मिलन की संभावना बनाए. बाहरी मौसम को भीतर के मौसम में बदल देना, यही सूफी सोच है.

निजामुद्दीन में बसंत: रंग, फूल, कव्वाली और साझा स्मृति

बसंत पंचमी के आसपास निजामुद्दीन इलाके में पीले फूलों की उपस्थिति बढ़ जाती है. कई लोग मानते हैं कि पीले फूल चढ़ाना सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि बसंत की उपस्थिति को दरगाह की पवित्रता के साथ जोड़ना है. कव्वाली के माहौल में बसंत के गीतों और ऋतु-भाव की झलक भी मिलती है. इस दिन का अनुभव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक भी होता है. यह दिल्ली की उस परंपरा की याद दिलाता है जहां लोग अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आकर एक ही जगह सुकून ढूंढ़ते हैं. बसंत का दिन इस सुकून को एक अलग ही रंग और सुगंध देता है.

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हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह. फोटो: Getty Images

बसंत पंचमी: आज के समय में इसका संदेश

आज के दौर में जब समाज अक्सर पहचान की कठोर रेखाओं में बंटा दिखता है, निजामुद्दीन-खुसरो बसंत की यह परंपरा एक वैकल्पिक दृष्टि देती है. परंपरा का अर्थ दीवारें खड़ी करना नहीं, पुल बनाना भी हो सकता है. 23 जनवरी 2026 को बसंत पंचमी मनाते समय निजामुद्दीन की दरगाह से जुड़ा यह सांस्कृतिक संदेश और प्रासंगिक हो जाता है कि मौसम का स्वागत केवल उत्सव नहीं, सह-जीवन की याद भी है. पीला रंग केवल परिधान नहीं, आशा का प्रतीक भी है. फूल केवल चढ़ावा नहीं, साझी स्मृति का संकेत भी हैं.

एक शहर, एक दरगाह, एक शायर और एक ऋतु

दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह, अमीर खुसरो और बसंत पंचमी का कनेक्शन दरअसल दिल्ली की आत्मा का कनेक्शन है. जहां आध्यात्म लोक-जीवन से अलग नहीं होता और लोक-उत्सव आध्यात्मिकता से पराया नहीं रहता. निजामुद्दीन औलिया की दरगाह इस मिलन का केंद्र है. अमीर खुसरो इस मिलन की आवाज़ हैं और बसंत पंचमी इस मिलन का रंग है. इस बसंत पंचमी पर जब लोग पीले फूल लेकर दरगाह की ओर बढ़ें, तो यह केवल एक परंपरा नहीं होगी. यह उस साझा सांस्कृतिक विरासत की पुन:स्वीकृति होगी जो कहती है-प्रेम का रंग सबसे गाढ़ा तब होता है, जब वह सबका हो.

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