10 साल में सिर्फ गेट! दरभंगा AIIMS को लेकर सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़; सरकार के कछुआ चाल पर नेटिजन्स ने लिए मजे

10 साल में सिर्फ गेट! दरभंगा AIIMS को लेकर सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़; सरकार के कछुआ चाल पर नेटिजन्स ने लिए मजे

पटना: बिहार के दरभंगा में प्रस्तावित AIIMS एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन निर्माण की रफ्तार के कारण नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर उड़ रहे मीम्स और तंज की वजह से. वायरल हो रही तस्वीरों और वीडियो में सिर्फ AIIMS का मेन गेट नजर आ रहा है. इसी को लेकर लोग सवाल उठा रहे हैं कि एक दशक बाद भी जमीन पर अस्पताल क्यों नहीं दिखता. वहीं, समर्थक इसे काम शुरू होने का संकेत मान रहे हैं.

AIIMS दरभंगा का मेन गेट सोशल मीडिया पर बहस का केंद्र बन गया है. यूजर्स तस्वीरें साझा कर यह कह रहे हैं कि सालों के इंतजार के बाद अस्पताल नहीं, सिर्फ गेट ही बन पाया है. कई पोस्ट में इसे विकास की धीमी रफ्तार का प्रतीक बताया जा रहा है. मीम्स और व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के जरिए लोग सिस्टम और प्लानिंग पर सवाल उठा रहे हैं.

कब और कैसे शुरू हुआ प्रोजेक्ट?

AIIMS दरभंगा की घोषणा सबसे पहले 2015 में हुई थी. जमीन विवाद और प्रशासनिक अड़चनों के कारण इसे मंजूरी मिलने में लंबा समय लगा. केंद्र सरकार ने 15 सितंबर 2020 को परियोजना को स्वीकृति दी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 नवंबर 2024 को इसकी नींव रखी. इसके बाद एक साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन जमीन पर बड़ा निर्माण नजर नहीं आता.

दूसरे AIIMS से हो रही तुलना

वायरल पोस्ट में AIIMS दरभंगा की तुलना राजकोट समेत अन्य राज्यों के AIIMS से की जा रही है. लोगों का कहना है कि वहां निर्माण कार्य तेजी से पूरा हुआ, जबकि दरभंगा में काम बेहद धीमा है. कई यूजर्स सवाल कर रहे हैं कि जब 2014 के बाद 19 नए AIIMS को मंजूरी दी गई, तो दरभंगा में देरी क्यों हो रही है.

देरी की वजहें क्या हैं?

AIIMS दरभंगा में देरी का सबसे बड़ा कारण जमीन का चयन और ट्रांसफर रहा. कई स्थान अनुपयुक्त पाए गए. आखिरकार शोभन बाईपास पर 187.44 एकड़ जमीन तय हुई, जिसे अगस्त 2024 में स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंपा गया. इसके बाद मॉनसून, चुनाव, हाई टेंशन लाइन शिफ्टिंग, अप्रोच रोड और DPR लागत बढ़ने जैसी दिक्कतें सामने आईं.

AIIMS दरभंगा 1264 करोड़ रुपये की लागत से बनाया जा रहा है. इसमें 750 बेड, 100 MBBS सीटें और सुपर स्पेशियलिटी विभाग होंगे. कार्यकारी निदेशक डॉ. माधवानंद कर के अनुसार, 2028 के अंत तक भवन तैयार होने की उम्मीद है. फिलहाल, उत्तरी बिहार के मरीजों को बेहतर इलाज के लिए बाहर जाना पड़ रहा है, इसलिए लोगों में निराशा बनी हुई है.

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