
नई दिल्ली: आज के समय में ज्यादातर कर्मचारी ऑफिस के अत्यधिक काम के दबाव, बर्नआउट, खराब वर्क-लाइफ बैलेंस और कम सैलरी के कारण मानसिक रूप से परेशान रहते हैं. लगातार काम का बोझ, समय की कमी और भविष्य की चिंता लोगों को चिड़चिड़ा और तनावग्रस्त बना देती है.
शारीरिक थकान के साथ-साथ मानसिक तनाव भी बढ़ता चला जाता है. लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक कहानी ने यह दिखा दिया कि कई बार कार्यस्थल की संवेदनहीनता सारी सीमाएं पार कर जाती है.
फ्रीलांस काम शुरू करने का फैसला
यह मामला अमेरिका के एक सोशल मीडिया प्रोफेशनल टायलर वेल्स से जुड़ा है. टायलर एक विज्ञापन एजेंसी में अच्छी सैलरी वाली नौकरी कर रहे थे. उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि साल 2024 में उन्हें ब्रेन कैंसर होने का पता चला. यह खबर उनके लिए पहले से ही बेहद कठिन थी, लेकिन इससे भी ज्यादा दर्द उन्हें अपने ऑफिस से मिला रवैया दे गया. टायलर के अनुसार, कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के बाद भी उन्हें अपने कार्यस्थल से न तो सहानुभूति मिली और न ही जरूरी सहयोग. मजबूरी में उन्होंने लाखों की नौकरी छोड़कर फ्रीलांस काम शुरू करने का फैसला किया.
I’m leaving my six-figure ad agency job in social media to go full-time freelance. Why? In 2024 I was diagnosed with brain cancer…
We have unlimited PTO where I work.
I was told I couldn’t use that PTO each month while I was on chemo because that “would be considered abuse of…— tyler wells (@tylerdw)
शख्स ने अपना दर्द साझा किया
टायलर वेल्स ने एक्स (पहले ट्विटर) पर अपना दर्द साझा किया. उन्होंने लिखा कि उनकी कंपनी में “अनलिमिटेड पेड लीव” यानी असीमित सवैतनिक अवकाश की सुविधा बताई जाती थी. लेकिन जैसे ही उनकी कीमोथेरेपी शुरू हुई, यह नीति उनके लिए बेकार साबित हुई. उन्हें कहा गया कि वे हर महीने इस सवैतनिक अवकाश का इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि इसे नीति का दुरुपयोग माना जाएगा. इसका मतलब था कि साल भर में उन्हें सिर्फ हर महीने 2-3 दिन की ही छुट्टी मिल सकती थी, जो इलाज के लिए बिल्कुल नाकाफी थी.
FMLA लेने की सलाह
इसके बजाय कंपनी ने उन्हें बिना वेतन वाली छुट्टी यानी FMLA लेने की सलाह दी. टायलर ने लिखा कि यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि कीमोथेरेपी से गुजर रहे किसी मरीज को कहा जाए कि वह बीमार होने पर भी अपनी छुट्टियों का इस्तेमाल नहीं कर सकता. उन्होंने यह भी बताया कि डॉक्टरों की सिफारिश के बावजूद जब उन्होंने अस्थायी रूप से काम का बोझ कम करने का अनुरोध किया, तो HR विभाग ने उसे भी ठुकरा दिया. टायलर के अनुसार, गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को पहले से ही बहुत सी चिंताएं होती हैं और उन्हें अपने इलाज के साथ-साथ बिलों और पैसों की चिंता नहीं करनी चाहिए.
इंसान को प्राथमिकता देने की जरूरत
अपनी पोस्ट में टायलर ने यह भी कहा कि वे भविष्य में ऐसे कानूनों की मांग करेंगे, जिनमें कैंसर और कीमोथेरेपी जैसे इलाज के दौरान कर्मचारियों को पूरा वेतन मिलना सुनिश्चित हो. उन्होंने लिखा कि यह सिर्फ नीतियों या स्वास्थ्य सुधार की बात नहीं है, बल्कि इंसानों को प्राथमिकता देने की जरूरत है. उन्होंने लोगों से इस मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए पोस्ट को लाइक, कमेंट और शेयर करने की अपील भी की.
लोगों ने प्रतिक्रिया दी
इस पोस्ट पर हजारों लोगों ने प्रतिक्रिया दी. कई यूजर्स ने कैंसर के दौरान अपने दर्दनाक अनुभव साझा किए. एक यूजर ने लिखा कि वह खुद कैंसर का इलाज करवा रहा है और अक्सर लोगों को कीमोथेरेपी के दौरान काम करते देखता है, जो बेहद दुखद है. दूसरे यूजर ने बताया कि उसने एक साल तक कीमोथेरेपी के दौरान काम किया क्योंकि वह बिना वेतन वाली छुट्टी का जोखिम नहीं उठा सकता था. वही, एक और यूजर ने लिखा कि इलाज के दौरान मदद न मिलने के कारण वह बेघर तक हो गया था. यह कहानी साफ दिखाती है कि कार्यस्थलों पर इंसानियत और संवेदनशीलता की कितनी बड़ी जरूरत है.
निष्कर्ष: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है. theindiadaily.com किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है.
