बड़ा फैसला! बांग्लादेश में जुलाई-अगस्त आंदोलन से संबद्ध मामले में पूर्व सांसद और 2 एएसपी समेत 3 अन्य को कोर्ट ने दी मौत की सजा

बड़ा फैसला! बांग्लादेश में जुलाई-अगस्त आंदोलन से संबद्ध मामले में पूर्व सांसद और 2 एएसपी समेत 3 अन्य को कोर्ट ने दी मौत की सजा

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ जुलाई-अगस्त 2024 में हुए आंदोलन के दौरान आशुलिया में हुई एक जघन्य घटना में ट्रिब्यूनल-2 ने पूर्व सांसद और 2 पूर्व एएसपी समेत 3 अन्य लोगों को मौत की सजा सुनाई है। ढाका ट्रिब्यून की खबर के अनुसार अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल-2 ने गुरुवार को पूर्व सांसद मुहम्मद सैफुल इस्लाम और पांच अन्य को अशुलिया में जुलाई-अगस्त विद्रोह के दौरान छह शवों को जलाने के मामले में यह सजा दी है।
बता दें कि ट्रिब्यूनल-2 की तीन सदस्यीय बेंच की अध्यक्षता जस्टिस नजरुल इस्लाम चौधरी ने की। उन्होंने अपने फैसले में पूर्व सांसद, 2 पूर्व एएसपी और 3 अन्य लोगों समेत कुल 6 व्यक्तियों को दोषी माना और सभी को मौत की सजा सुनाई। सजा पाने वालों में एएफएम सैयद, अब्दुल मालेक, विश्वजीत शाहा, मुकुल चोकदार और रॉनी भुइयां शामिल हैं।
पूर्व सांसद सैफुल इस्लाम इस मामले में मुख्य आरोपी थे, जिसमें विरोध प्रदर्शनों के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों का आरोप था। इस मामले में कुल 16 आरोपियों में से आठ गिरफ्तार किए गए थे। ये हैं ढाका जिला पुलिस के पूर्व अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अब्दुल्लाहिल काफ़ी, पूर्व अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शाहिदुल इस्लाम, डीबी इंस्पेक्टर आरफात हुसैन, सब-इंस्पेक्टर अब्दुल मालेक, आरफात उद्दीन, कांस्टेबल मुकुल चोकदार और कमरुल हसन तथा शेख अब्जलुल हक का नाम शामिल है। 21 अगस्त 2024 को ट्रिब्यूनल ने सभी 16 आरोपियों पर औपचारिक रूप से आरोप तय किए और मुकदमे की शुरुआत की। कांस्टेबल शेख अब्जलुल हक ने दोष स्वीकार किया और उन्हें राज्य गवाह का दर्जा दिया गया।
मामले के अनुसार, पिछले साल 5 अगस्त को अशुलिया में पुलिस ने छह युवकों को गोली मार दी, जिसके बाद उनके शवों को पुलिस वैन पर रखकर जला दिया गया। इस भयावह घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हुआ, जिसने पूरे देश को हिला दिया। इस वीडियो से पीड़ित परिवारों को दो शिकारों की पहचान करने में मदद मिली। वीडियो में पुलिस वैन के पीछे कई शव पड़े दिख रहे हैं, जबकि पुलिसकर्मी एक और शव को वैन पर लोड करते नजर आ रहे हैं। शवों को गंदे कपड़ों और सड़क पर मिले बैनरों से ढककर आग लगा दी गई। जांच में पता चला कि एक पीड़ित आग लगाने के समय अभी जिंदा था, जिससे उसकी मौत हो गई। यह मामला 11 सितंबर 2024 को ट्रिब्यूनल में दायर किया गया था।

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