World Pulses Day: कब और क्यों हुई थी इस दिन की शुरुआत? सेहत और खेती से जुड़ा है इसका उद्देश्य

World Pulses Day: कब और क्यों हुई थी इस दिन की शुरुआत? सेहत और खेती से जुड़ा है इसका उद्देश्य

Importance Of Pulses: हर साल 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य न केवल प्रोटीन के इस सबसे सस्ते स्रोत के प्रति जागरूकता बढ़ाना है बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। दालों के उत्पादन में भारत आज दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुका है।

भारतीय रसोई में दाल का स्थान सबसे ऊपर है। चाहे वो अरहर हो, मूंग या मसूर, दालें न केवल स्वाद बढ़ाती हैं बल्कि भी हैं। स्वास्थ्य और पोषण सुरक्षा में दालों के महत्व को पूरी दुनिया तक पहुंचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने साल 2019 से विश्व दलहन दिवस मनाने की शुरुआत की थी।

दुनिया का पल्स हब

भारत आज दुनिया में दालों के उत्पादन और उपभोग दोनों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। वैश्विक दलहन उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 24 फीसदी है। यानी दुनिया की हर चौथी कटोरी दाल भारत की मिट्टी से आती है। आंकड़ों के मुताबिक भारत का दलहन उत्पादन 140 लाख टन से बढ़कर 240 लाख टन के पार पहुंच गया है। साल 2020-21 के दौरान भारत ने करीब 2116 करोड़ रुपये मूल्य की दालों का निर्यात कर अपनी आर्थिक ताकत का भी लोहा मनवाया है।

खेती और पर्यावरण के लिए वरदान

दालें सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि धरती के लिए भी फायदेमंद हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार दालों की खेती में अन्य फसलों के मुकाबले बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है। जहां एक किलो बीफ तैयार करने में 13,000 लीटर पानी खर्च होता है वहीं एक किलो दाल मात्र 1250 लीटर पानी में तैयार हो जाती है।

इसके अलावा दालें नाइट्रोजन स्थिरीकरण के जरिए मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को बढ़ाती हैं। इसका मतलब है कि किसानों को अलग से महंगे सिंथेटिक उर्वरकों की जरूरत कम पड़ती है जिससे खेती की लागत घटती है और मिट्टी का स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है।

सेहत का खजाना है दलहन

दालें शाकाहारियों के लिए प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत हैं। ये लो-फैट, फाइबर से भरपूर और ग्लूटन-फ्री होती हैं। इनमें सोडियम की मात्रा कम होती है जो इसे हृदय रोगियों और मधुमेह से जूझ रहे लोगों के लिए एक आदर्श सुपरफूड बनाता है।

विश्व हमें याद दिलाता है कि दालें केवल एक डिश नहीं बल्कि एक टिकाऊ भविष्य की नींव हैं। भारत सरकार की आत्मनिर्भरता की मुहिम और किसानों की मेहनत ने आज देश को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना दिया है जिससे न केवल कुपोषण से लड़ने में मदद मिल रही है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो रही है।

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