
उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित पंचायत चुनाव के टलने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। चुनावी तैयारियों के बीच योगी सरकार ने हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में हलफनामा दाखिल कर बताया है कि स्थानीय निकाय चुनाव से पहले एक समर्पित पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग का गठन किया जाएगा। इसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पंचायत सीटों पर आरक्षण तय होगा, जिसके बाद ही चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
मामले की सुनवाई जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की पीठ कर रही है। दरअसल, हाईकोर्ट में दाखिल एक याचिका में मौजूदा पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकारों को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया था कि वर्तमान आयोग को स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण निर्धारण का कानूनी अधिकार नहीं है। इसके जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया कि नया समर्पित आयोग गठित कर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई की जाएगी।
रैपिड सर्वे के बाद तय होगा आरक्षण
सरकार ने कोर्ट को बताया कि नया आयोग पिछड़े वर्गों का ‘रैपिड सर्वे’ करेगा, जिससे उनकी वास्तविक आबादी का आकलन किया जा सके। इसी सर्वे रिपोर्ट के आधार पर पंचायत सीटों का आरक्षण निर्धारित होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों में स्पष्ट किया है कि स्थानीय निकाय चुनाव से पहले एक समर्पित आयोग का गठन अनिवार्य है, जिसका कार्यकाल तीन वर्ष का होना चाहिए।
प्रदेश का मौजूदा ओबीसी आयोग अक्टूबर 2025 में अपना मूल कार्यकाल पूरा कर चुका है। हालांकि उसका कार्यकाल अक्टूबर 2026 तक बढ़ाया गया है, लेकिन उसे समर्पित आयोग के विशेष अधिकार प्राप्त नहीं हैं। इसी कानूनी स्थिति को देखते हुए सरकार ने नया आयोग गठित करने का निर्णय लिया है। सरकार का कहना है कि आयोग की अंतिम रिपोर्ट मिलने के बाद ही पंचायत चुनाव की तारीखों की घोषणा संभव होगी।
सियासी गलियारों में चर्चा तेज
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव कराने को लेकर सत्तारूढ़ दल को मिश्रित संकेत मिल रहे हैं। पार्टी के भीतर यह आशंका जताई जा रही है कि पंचायत चुनाव में स्थानीय स्तर पर पार्टी के नेता और कार्यकर्ता आमने-सामने आ सकते हैं, जिससे आगामी विधानसभा चुनाव में असंतोष की स्थिति बन सकती है। यही वजह है कि पहले विधानसभा चुनाव कराने और उसके बाद पंचायत चुनाव कराने की रणनीति पर भी मंथन की बात सामने आ रही है।
