मौत के बाद भी सुनता रहता है इंसान! आखिर कैसे? नई रिसर्च में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

मौत के बाद भी सुनता रहता है इंसान! आखिर कैसे? नई रिसर्च में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

नई दिल्ली: मौत हमेशा से ही मानव सभ्यता और विज्ञान के लिए एक रहस्यमयी पहेली रही है. क्या धड़कन रुकते ही चेतना खत्म हो जाती है? इस सवाल पर वर्षों से बहस जारी है, लेकिन न्यूयॉर्क में हुए एक ताजा शोध ने मौत की पारंपरिक परिभाषा को ही चुनौती दे दी है. वैज्ञानिकों का दावा है कि दिल की धड़कन रुकने के बाद भी इंसान का दिमाग कुछ समय तक जीवित और सक्रिय रहता है, और वह अपने आसपास की आवाजें भी सुन सकता है.

एनवाईयू लैंगोन मेडिकल सेंटर (NYU Langone Medical Center) के डॉक्टर सैम पारनिया के नेतृत्व में की गई इस स्टडी ने दुनिया को चौंका दिया है. शोध में पाया गया कि कई बार मरीज डॉक्टरों द्वारा अपनी मौत का समय घोषित किए जाने तक को स्पष्ट रूप से सुन लेते हैं. डॉक्टर पारनिया ने अमेरिका और ब्रिटेन के 25 अस्पतालों में कार्डियक अरेस्ट से बचे 53 मरीजों की दिमागी गतिविधियों का गहराई से अध्ययन किया. इनमें से करीब 40 फीसदी मरीजों ने बताया कि 'मौत' के क्षणों में भी उनके पास सचेत विचार और यादें मौजूद थीं.

दिमाग में 'रीबूट' होता ऊर्जा का संचार 

इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राम (EEG) के जरिए किए गए परीक्षणों में एक विस्मयकारी तथ्य सामने आया. दिल रुकने के 35 से 60 मिनट बाद तक मरीजों के मस्तिष्क में गामा, डेल्टा, थीटा, अल्फा और बीटा जैसी 'ब्रेन वेव्स' देखी गईं. ये वही तरंगें हैं जो उच्च स्तरीय सोच और जागरूकता से जुड़ी होती हैं. डॉक्टर पारनिया के अनुसार, यह अनुभव मतिभ्रम या कोई सपना नहीं है, बल्कि यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई बंद होता कंप्यूटर अचानक 'रीबूट' हो रहा हो. पहले यह माना जाता था कि दिल रुकने के 10 मिनट बाद दिमाग स्थायी रूप से नष्ट हो जाता है, लेकिन यह शोध साबित करता है कि CPR जारी रहने पर दिमाग उम्मीद से कहीं ज्यादा समय तक सक्रिय रह सकता है.

शरीर से अलग होने का अनुभव 

स्टडी में शामिल कई मरीजों ने बताया कि उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे वे अपने शरीर से अलग हो चुके हैं और कमरे में हो रही हर गतिविधि को देख और पहचान रहे हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि मौत के दौरान ऊर्जा का यही उभार लोगों को अपने पूरे जीवन की यादें एक फिल्म की तरह देखने का अनुभव प्रदान करता है. 'रेसुसिटेशन' (Resuscitation) जर्नल में प्रकाशित यह अध्ययन न केवल चिकित्सा विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह जीवन और मृत्यु के बीच की उस धुंधली रेखा को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम है.

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