
Mobile Screen Effects On Brain: मोबाइल और लैपटॉप की ब्राइट स्कीन से ब्रेन पर असर पड़ता है, खासकर बच्चों के. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर उनको कौन सी दिक्कत होती है इससे….
आज के समय में मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप बच्चों के लिए जैसे डिजिटल बेबीसिटर बन चुके हैं. लेकिन डॉक्टरों और एक्सपर्ट की चिंता यह है कि ब्राइट स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों के दिमाग को जल्दी थका रहा है और इसका असर नींद, ध्यान और व्यवहार पर साफ दिखने लगा है.
कई घरों में अब यह आम सीन है कि बच्चा स्क्रीन में डूबा रहता है, खाना और होमवर्क पीछे छूट जाता है और सोने का समय टलता चला जाता है. क्लिनिक में जांच के दौरान यह सिर्फ जिद या अनुशासन की कमी नहीं, बल्कि स्क्रीन पर निर्भरता जैसे लक्षण नजर आते हैं.
एक्सपर्ट बताते हैं कि लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों का दिमाग बार-बार नई चीजों की तलाश में रहता है. मोबाइल और लैपटॉप पर तेजी से बदलता कंटेंट दिमाग को लगातार एक्टिव रखता है, जिससे मानसिक थकान जल्दी होने लगती है और फोकस करने की क्षमता घटती है.
स्क्रीन का सबसे बड़ा असर नींद पर पड़ता है. देर तक मोबाइल या लैपटॉप देखने से बच्चों की नींद देर से आती है और स्क्रीन की रोशनी शरीर के नेचुरल स्लीप हार्मोन को भी प्रभावित करती है. इसका नतीजा यह होता है कि अगला दिन चिड़चिड़ापन और थकान के साथ शुरू होता है.
धीरे-धीरे बच्चे इमोशनल रूप से भी स्क्रीन पर निर्भर होने लगते हैं. बोरियत, तनाव या पढ़ाई का दबाव आते ही स्क्रीन राहत का आसान जरिया बन जाती है, जिससे बिना मोबाइल या लैपटॉप के छोटी-छोटी परेशानियां भी बड़ी लगने लगती हैं.
डॉक्टर मानते हैं कि हर स्क्रीन इस्तेमाल समस्या नहीं है, लेकिन जब इसके बिना बच्चा बेचैन हो जाए, गुस्सा करने लगे या पढ़ाई और खेल से दूरी बना ले, तो यह चेतावनी का संकेत है. असली समस्या स्क्रीन का समय नहीं, बल्कि उससे होने वाला मानसिक असर है.
एक्सपर्ट का कहना है कि समाधान पूरी तरह मोबाइल छीनना नहीं है, बल्कि संतुलन बनाना जरूरी है. बच्चों के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल सीमित और समझदारी से हो, ताकि उनका दिमाग थके नहीं और वे मानसिक रूप से स्वस्थ रह सकें.
